इक लड़की जो मुझ सेे लंबी है

मुझ को वो अच्छी लगती है

उस को भी इंट्रेस्ट है मुझ
में
लोगों की परवाह करती है

कितना शर्माती है देखो
नज़रों से ओझल रहती है

खोयी खोयी सी लगती है
पागल सी दीवानी सी है

नाम नहीं लेती मेरा वो
देखो तो कितनी पगली है

दूर से कहती है ओ मजनू
पास आने से घबराती है

बात नहीं करती मुझ से वो
कुछ भी पूछूँ हँस देती है

सुलझाती है सबके मैटर
ख़ुद इक अनसुलझी गुत्थी है

— Ajeetendra Aazi Tamaam

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