jo ye kahtaa tha mohabbat ke bina kuchh bhi nahin | जो ये कहता था मोहब्बत के बिना कुछ भी नहीं

  - Faiz Ahmad

जो ये कहता था मोहब्बत के बिना कुछ भी नहीं
उसकी नज़रों में मोहब्बत सा दिखा कुछ भी नहीं

जिसकी खा़तिर मैं ख़ुशी से हुआ इतना बर्बाद
वो समझता है के मुझ से तो नफा़ कुछ भी नहीं

ले गई मुझ से चुरा के मुझे वो साथ अपने
उसकी यादों के सिवा मुझ
में रहा कुछ भी नहीं

दिल से चीख़ूँ के ज़बाँ से भला क्या फ़ायदा हो
उसके नज़दीक मोहब्बत की सदा कुछ भी नहीं

उसके आने से ही उठती थी बहारों में महेक
बिना उसके तो मिरी बाद-ए-सबा कुछ भी नहीं

जिसके होने से मुयस्सर था मुझे सारा जहाँँ
वो गई क्या के मिरे पास बचा कुछ भी नहीं

एक पल के लिए वो रुक भी अगर जाए तो
ज़िन्दगी फिर मिरी इक पल के सिवा कुछ भी नहीं

जो करे है तो तड़पता फिरे है हिज्र में बस
सच कहें 'फ़ैज़' मोहब्बत में रखा कुछ भी नहीं

  - Faiz Ahmad

Zindagi Shayari

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