अब इश्क़ में इस फ़र्क को भी आम किया जाए
लड़का हो या लड़की हो कि बदनाम किया जाए
हम ने सर-ए-बाज़ार उसे अपना कहा था
लाज़िम है हमें रुस्वा सर-ए-आम किया जाए
बुर्के़ के बिना घूम रही है तू बिछड़ कर
यूँ फिर तो तिरे ज़िक्र को भी आम किया जाए
अब कौन पढ़े तेरी पुर-उर्दू भरी ग़ज़लें
दरकार-ए-जदीदी है इसे आम किया जाए
रुस्वाई से किस बात का डर हो हमें 'अहमद'
शाइ'र को ज़रूरी है कि बदनाम किया जाए
— Faiz Ahmad















