साथ अपने किसी महफिल में बिठाते नहीं हैं
अपना कहते हैं मुझे, अपना बताते नहीं हैं
तुम जो कहती हो ये मुझ सेे कि भुला दूँ तुम को
जान-ए-जाँ पहली मोहब्बत को भुलाते नहीं हैं
तुम नुमाइश भी कराते हो बड़े फ़क्र के साथ
हम तो ज़ख़्मों का मुदावा भी कराते नहीं हैं
आइने से मिरी चाहत का तू इज़्हार न कर
ये तो वो राज़ है ख़ुद को भी बताते नहीं हैं
उसने बतलाया निसाबों में लिखा है 'अहमद'
इक सुख़नवर से कभी 'इश्क़ लड़ाते नहीं हैं
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