न गुमान मौत का है न ख़याल ज़िंदगी का

सो ये हाल इन दिनों है मिरे दिल की बे-कसी का

मैं शिकस्ता बाम ओ दर में जिसे जा के ढूँडता था
कोई याद थी किसी की कोई नाम था किसी का

मैं हवाओं से हिरासाँ वो घुटन से दिल-गिरफ़्ता
मैं चराग़ तीरगी का वो गुलाब रौशनी का

अभी रेल के सफ़र में हैं बहुत निहाल दोनों
कहीं रोग बन न जाए यही साथ दो घड़ी का

कोई शहर आ रहा है तो ये ख़ौफ़ आ रहा है
कोई जाने कब उतर ले कि भरोसा क्या किसी का

कोई मुख़्तलिफ़ नहीं है ये धुआँ ये राएगानी
कि जो हाल शहर का है वही अपनी शा'इरी का

— Aitbar Sajid

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