utho hind ke baagbaano utho | उठो हिन्द के बाग़बानो उठो

  - Ali Sardar Jafri

उठो हिन्द के बाग़बानो उठो
उठो इंक़िलाबी जवानो उठो
किसानों उठो काम-गारो उठो
नई ज़िंदगी के शरारो उठो
उठो खेलते अपनी ज़ंजीर से
उठो ख़ाक-ए-बंगाल-ओ-कश्मीर से
उठो वादी ओ दश्त ओ कोहसार से
उठो सिंध ओ पंजाब ओ मल्बार से
उठो मालवे और मेवात से
महाराष्ट्र और गुजरात से
अवध के चमन से चहकते उठो
गुलों की तरह से महकते उठो
उठो खुल गया परचम-ए-इंक़लाब
निकलता है जिस तरह से आफ़्ताब
उठो जैसे दरिया में उठती है मौज
उठो जैसे आँधी की बढ़ती है फ़ौज
उठो बर्क़ की तरह हँसते हुए
कड़कते गरजते बरसते हुए
ग़ुलामी की ज़ंजीर को तोड़ दो
ज़माने की रफ़्तार को मोड़ दो

  - Ali Sardar Jafri

Kashmir Shayari

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    तख़्लीक़ पे फ़ितरत की गुज़रता है गुमाँ और
    इस आदम-ए-ख़ाकी ने बनाया है जहाँ और

    ये सुब्ह है सूरज की सियाही से अँधेरी
    आएगी अभी एक सहर महर-चकाँ और

    बढ़नी है अभी और भी मज़लूम की ताक़त
    घटनी है अभी ज़ुल्म की कुछ ताब-ओ-तवाँ और

    तर होगी ज़मीं और अभी ख़ून-ए-बशर से
    रोएगा अभी दीदा-ए-ख़ूनाबा-फ़िशाँ और

    बढ़ने दो ज़रा और अभी कुछ दस्त-ए-तलब को
    बढ़ जाएगी दो चार शिकन-ए-ज़ुल्फ़-ए-बुताँ और

    करना है अभी ख़ून-ए-जिगर सर्फ़-ए-बहाराँ
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    Ali Sardar Jafri
    वही है वहशत वही है नफ़रत आख़िर इस का क्या है सबब
    इंसाँ इंसाँ बहुत रटा है इंसाँ इंसाँ बनेगा कब

    वेद उपनिषद पुर्ज़े पुर्ज़े गीता क़ुरआँ वरक़ वरक़
    राम-ओ-कृष्न-ओ-गौतम-ओ-यज़्दाँ ज़ख़्म-रसीदा सब के सब

    अब तक ऐसा मिला न कोई दिल की प्यास बुझाता जो
    यूँ मय-ख़ाना-चश्म बहुत हैं बहुत हैं यूँ तो साक़ी-लब

    जिस की तेग़ है दुनिया उस की जिस की लाठी उस की भैंस
    सब क़ातिल हैं सब मक़्तूल हैं सब मज़लूम हैं ज़ालिम सब

    ख़ंजर ख़ंजर क़ातिल अबरू दिलबर हाथ मसीहा होंट
    लहू लहू है शाम-ए-तमन्ना आँसू आँसू सुब्ह-ए-तरब

    देखें दिन फिरते हैं कब तक देखें फिर कब मिलते हैं
    दिल से दिल आँखों से आँखें हाथ से हाथ और लब से लब

    ज़ख़्मी सरहद ज़ख़्मी क़ौमें ज़ख़्मी इंसाँ ज़ख़्मी मुल्क
    हर्फ़-ए-हक़ की सलीब उठाए कोई मसीह तो आए अब
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    Ali Sardar Jafri
    फ़स्ल-ए-गुल फ़स्ल-ए-ख़िज़ाँ जो भी हो ख़ुश-दिल रहिए
    कोई मौसम हो हर इक रंग में कामिल रहिए

    मौज ओ गिर्दाब ओ तलातुम का तक़ाज़ा है कुछ और
    रहिए मोहतात तो बस ता-लब-ए-साहिल रहिए

    देखते रहिए कि हो जाए न कम शान-ए-जुनूँ
    आइना बन के ख़ुद अपने ही मुक़ाबिल रहिए

    उन की नज़रों के सिवा सब की निगाहें उट्ठीं
    महफ़िल-ए-यार में भी ज़ीनत-ए-महफ़िल रहिए

    दिल पे हर हाल में है सोहबत-ए-ना-जिंस हराम
    हैफ़-सद-हैफ़ कि ना-जिंसों में शामिल रहिए

    दाग़ सीने का दहकता रहे जलता रहे दिल
    रात बाक़ी है जहाँ तक मह-ए-कामिल रहिए

    जानिए दौलत-ए-कौनैन को भी जिंस-ए-हक़ीर
    और दर-ए-यार पे इक बोसे के साइल रहिए

    आशिक़ी शेव-ए-रिंदान-ए-बला-कश है मियाँ
    वजह-ए-शाइस्तगी-ए-ख़ंजर-ए-क़ातिल रहिए
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    Ali Sardar Jafri
    वही हुस्न-ए-यार में है वही लाला-ज़ार में है
    वो जो कैफ़ियत नशे की मय-ए-ख़ुश-गवार में है

    ये चमन की आरज़ू है कोई लूट ले चमन को
    ये तमाम रंग-ओ-निकहत तिरे इख़्तियार में है

    तिरे हाथ की बुलंदी में फ़रोग़-ए-कहकशाँ है
    ये हुजूम-ए-माह-ओ-अंजुम तिरे इंतिज़ार में है

    बस उसी को तोड़ना है ये जुनून-ए-नफ़अ'-ख़ोरी
    यही एक सर्द ख़ंजर दिल-ए-रोज़गार में है

    अभी ज़िंदगी हसीं है अभी ज़िक्र-ए-मौत कैसा
    अभी फूल खिल रहे हैं अभी तो कनार में है

    अभी मय-कदा जवाँ है अभी मौज में है साक़ी
    अभी जाम रक़्स में है अभी मय बहार में है

    यही मेरा शेर-ओ-नग़्मा यही मेरी फिक्र-ओ-हिकमत
    जो सुरूर-ओ-दर्द-मंदी दिल-ए-बे-क़रार में है
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    Ali Sardar Jafri
    दिल की आग जवानी के रुख़्सारों को दहकाए है
    बहे पसीना मुखड़े पर या सूरज पिघला जाए है

    मन इक नन्हा सा बालक है हुमक हुमक रह जाए है
    दूर से मुख का चाँद दिखा कर कौन उसे ललचाए है

    मय है तेरी आँखों में और मुझ पे नशा सा तारी है
    नींद है तेरी पलकों में और ख़्वाब मुझे दिखलाए है

    तेरे क़ामत की लर्ज़िश से मौज-ए-मय में लर्ज़िश है
    तेरी निगह की मस्ती ही पैमानों को छलकाए है

    तेरा दर्द सलामत है तो मरने की उम्मीद नहीं
    लाख दुखी हो ये दुनिया रहने की जगह बन जाए है
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    Ali Sardar Jafri

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