सुकूत-ए-शाम का हिस्सा तू मत बना मुझ को

मैं रंग हूँ सो किसी मौज में मिला मुझ को

मैं इन दिनों तिरी आँखों के इख़्तियार में हूँ
जमाल-ए-सब्ज़ किसी तजरबे में ला मुझ को

मैं बूढे जिस्म की ज़िल्लत उठा नहीं सकता
किसी क़दीम तजल्ली से कर नया मुझ को

मैं अपने होने की तकमील चाहता हूँ सखी
सो अब बदन की हिरासत से कर रिहा मुझ को

मुझे चराग़ की हैरत भी हो चुकी मालूम
अब इस से आगे कोई रास्ता बता मुझ को

उस इस्म-ए-ख़ास की तरकीब से बना हूँ मैं
मोहब्बतों के तलफ़्फ़ुज़ से कर नया मुझ को

दरून-ए-सीना जिसे दिल समझ रहा था 'अली'
वो नीली आग है ये अब पता चला मुझ को

— Ali Zaryoun

More by Ali Zaryoun

Other ghazal from the same pen

See all from Ali Zaryoun →

Travel Shayari Collection

Shers of travel shayari collection.

All Travel Shayari Collection poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling