ग़म-ए-फ़ुर्क़त ही में मरना हो तो दुश्वार नहीं

शादी-ए-वस्ल भी आशिक़ को सज़ा-वार नहीं

ख़ूब-रूई के लिए ज़िश्ती-ए-ख़ू भी है ज़रूर
सच तो ये है कि कोई तुझ सा तरह-दार नहीं

क़ौल देने में तअम्मुल न क़सम से इनकार
हम को सच्चा नज़र आता कोई इक़रार नहीं

कल ख़राबात में इक गोशे से आती थी सदा
दिल में सब कुछ है मगर रुख़्सत-ए-गुफ़्तार नहीं

हक़ हुआ किस से अदा उस की वफ़ादारी का
जिस के नज़दीक जफ़ा बाइस-ए-आज़ार नहीं

देखते हैं कि पहुँचती है वहाँ कौन सी राह
का'बा ओ दैर से कुछ हम को सरोकार नहीं

होंगे क़ाइल वो अभी मतला-ए-सानी सुन कर
जो तजल्ली में ये कहते हैं कि तकरार नहीं

— Altaf Hussain Hali

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