निगाह-ए-मस्त में क्या रंग-ए-वालिहाना था
सुरूर-ओ-कैफ़ में डूबा हुआ ज़माना था
किसी की उठती जवानी का जब ज़माना था
मिरी निगाह का हर फ़े'ल शाइ'राना था
सितम-नसीब की अल्लाह रे सोख़्ता बख़्ती
है बिजलियों का नशेमन जो आशियाना था
अज़ल से क़ैद-ए-अनासिर अता हुई मुझ को
मिरे नसीब में ज़िंदाँ का आब-ओ-दाना था
वुफ़ूर-ए-दर्द से जब हिचकियाँ सी आने लगीं
हर एक ज़ख़्म के लब पर मिरा फ़साना था
शुरू-ए-इश्क़ में क्या मेरी शाइ'री थी न पूछ
फ़लक पे मुर्ग़-ए-तख़य्युल का आशियाना था
वतन में हज़रत-ए-'अलताफ़' ज़िंदगी अपनी
बहार ख़ुल्द-ए-मोहब्बत का इक फ़साना था
— Altaf Mashhadi















