उस के कंगन से मोहब्बत की खनक आती है
ज़र्द-रू रातों में चंदन की महक आती है
भीड़ में गुम हुए बच्चे की तरह मेरा दिल
देख लूँ माँ को तो आँखों में चमक आती है
गाँव का घर घर के आँगन में खिली वो तुलसी
घर से अब पाँव बढ़ाता हूँ सड़क आती है
ज़िक्र होता है तिरा जब भी किसी महफ़िल में
मौत क़दमों से ये सीने पे सरक आती है
दफ़्न हैं कितने मोहब्बत के फ़साने उस पर
गाँव से लड़ के शहर को जो सड़क आती है
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