ye kisi shaKHs ko khone ki talaafi thehra | ये किसी शख़्स को खोने की तलाफ़ी ठहरा

  - Ameer Imam

ये किसी शख़्स को खोने की तलाफ़ी ठहरा
मेरा होना मिरे होने में इज़ाफ़ी ठहरा

जुर्म-ए-आदम तिरी पादाश थी दुनिया सारी
आख़िरश हर कोई हक़दार-ए-मुआ'फ़ी ठहरा

ये है तफ़्सील कि यक-लम्हा-ए-हैरत था कोई
मुख़्तसर ये कि मिरी 'उम्र को काफ़ी ठहरा

कुछ अयाँ हो न सका था तिरी आँखों जैसा
वो बदन हो के बरहना भी ग़िलाफ़ी ठहरा

जब ज़मीं घूम रही हो तो ठहरना कैसा
कोई ठहरा तो ठहरने के मुनाफ़ी ठहरा

क़ाफ़िया मिलते गए 'उम्र ग़ज़ल होती गई
और चेहरा तिरा बुनियाद-ए-क़वाफ़ी ठहरा

  - Ameer Imam

Duniya Shayari

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