क़ैद लगती है ये भी जैसे क़फ़स में
चार दिन की ज़िंदगी ये सौ बरस में
रूठ कर ऐसे गया मुझ से वो इक दिन
जैसे तो था ही नहीं वो दस्तरस में
अब नहीं करता कोई ख़ातिर किसी के
है कहाँ अब तो किसी के कुछ भी बस में
अब जला देगी हवा ये ठंडी मुझ को
अच्छा लगने है लगा मुझ को उमस में
सारी दुनिया ही है अब इस के तलब में
कहते हो तुम कुछ नहीं रक्खा हवस में
— Amit Kumar















