saaye dhalne charaagh jalne lage | साए ढलने चराग़ जलने लगे

  - Amjad Islam Amjad

साए ढलने चराग़ जलने लगे
लोग अपने घरों को चलने लगे

इतनी पुर-पेच है भँवर की गिरह
जैसे नफ़रत दिलों में पलने लगे

दूर होने लगी जरस की सदा
कारवाँ रास्ते बदलने लगे

उस के लहजे में बर्फ़ थी लेकिन
छू के देखा तो हाथ जलने लगे

उस के बंद-ए-क़बा के जादू से
साँप से उँगलियों में चलने लगे

राह-ए-गुम-कर्दा ताएरों की तरह
फिर सितारे सफ़र पे चलने लगे

फिर निगाहों में धूल उड़ती है
अक्स फिर आइने बदलने लगे

  - Amjad Islam Amjad

Pollution Shayari

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    तुम्हारा हाथ जब मेरे लरज़ते हाथ से छूटा ख़िज़ाँ के आख़िरी दिन थे
    वो मोहकम बे-लचक वा'दा खिलौने की तरह टूटा ख़िज़ाँ के आख़िरी दिन थे

    बहार आई न थी लेकिन हवाओं में नए मौसम की ख़ुश्बू रक़्स करती थी
    अचानक जब कहा तुम ने मिरे मुँह पर मुझे झूटा ख़िज़ाँ के आख़िरी दिन थे

    वो क्या दिन थे यहीं हम ने बहारों की दुआ की थी किसी ने भी नहीं सोचा
    चमन वालों ने मिल कर जब ख़ुद अपना ही चमन लूटा ख़िज़ाँ के आख़िरी दिन थे

    लिखा था एक तख़्ती पर कोई भी फूल मत तोड़े मगर आँधी तो अन-पढ़ थी
    सो जब वो बाग़ से गुज़री कोई उखड़ा कोई टूटा ख़िज़ाँ के आख़िरी दिन थे

    बहुत ही ज़ोर से पीटे हवा के बैन पर सीने हमारे ख़ैर-ख़्वाहों ने
    कि चाँदी के वरक़ जैसा समय ने जब हमें कूटा ख़िज़ाँ के आख़िरी दिन थे

    न रुत थी आँधियों की ये न मौसम था हवाओं का तो फिर ये क्या हुआ 'अमजद'
    हर इक कोंपल हुई ज़ख़्मी हुआ मजरूह हर बूटा ख़िज़ाँ के आख़िरी दिन थे
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    Amjad Islam Amjad
    ज़िंदगानी जावेदानी भी नहीं
    लेकिन इस का कोई सानी भी नहीं

    है सवा-नेज़े पे सूरज का अलम
    तेरे ग़म की साएबानी भी नहीं

    मंज़िलें ही मंज़िलें हैं हर तरफ़
    रास्ते की इक निशानी भी नहीं

    आइने की आँख में अब के बरस
    कोई अक्स-ए-मेहरबानी भी नहीं

    आँख भी अपनी सराब-आलूद है
    और इस दरिया में पानी भी नहीं

    जुज़ तहय्युर गर्द-बाद-ए-ज़ीस्त में
    कोई मंज़र ग़ैर-फ़ानी भी नहीं

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    Amjad Islam Amjad
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    इक और मौज कि ऐ सैल-ए-इश्तिबाह अभी
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    तिरे फ़िराक़ की सदियाँ तिरे विसाल के पल
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    Amjad Islam Amjad
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    झुक के तकने लगा हर सितारा मुझे

    तेरा ग़म इस फ़िशार-ए-शब-ओ-रोज़ में
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    हर सितारे की बुझती हुई रौशनी
    मेरे होने का है इस्तिआरा मुझे

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    जो कि मुझ पर करे आश्कारा मुझे

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    तू ने किस झुटपुटे में उतारा मुझे

    अक्स-ए-इमरोज़ में नक़्श-ए-दीरोज़ में
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    आगही ने कहाँ ला के मारा मुझे
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    Amjad Islam Amjad
    आँखों से इक ख़्वाब गुज़रने वाला है
    खिड़की से महताब गुज़रने वाला है

    सदियों के इन ख़्वाब-गज़ीदा शहरों से
    महर-ए-आलम-ताब गुज़रने वाला है

    जादूगर की क़ैद में थे जब शहज़ादे
    क़िस्से का वो बाब गुज़रने वाला है

    सन्नाटे की दहशत बढ़ती जाती है
    बस्ती से सैलाब गुज़रने वाला है

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    हस्ती 'अमजद' दीवाने का ख़्वाब सही
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    Amjad Islam Amjad

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