लगाओ आग आओ भाईसाहब
लगाकर फिर बुझाओ भाईसाहब
अगर अब पाप से मन भर गया हो
उठो गंगा नहाओ भाईसाहब
ये नाटक ब्लॉक और अनब्लॉक का बस
चलो नंबर मिटाओ भाईसाहब
अगर कई लाख का रुतबा तुम्हारा
ज़रा ज़ीरो हटाओ भाईसाहब
यहीं बैठा हूँ मेरे क़ातिलों को
बुलाकर आज लाओ भाईसाहब
बहुत बोए ज़मीं में रोज़ सरसों
हथेली पर उगाओ भाईसाहब
— Anmol Mishra















