मंज़िल मिली उसी को इसी इक लगन के साथ

छानी हो खाक़ जिस ने भी अपने बदन के साथ

उस शख़्स से ना पूछिये उस की ख़ुशी का हाल
जिस ने गुज़ारे दिन कई इक पैरहन के साथ

अपने किए पे उस को नदामत नहीं है आज
रहबर खड़ा है मेरा किसी राहज़न के साथ

जिस अंजुमन में उस की ख़िलाफ़त हुई हो रोज़
देखा है हम ने उस को उसी अंजुमन के साथ

जिस शख़्स को ये रंज हो महकेंगे अब तो फूल
खिलवाड़ वो ही करता है अपने चमन के साथ

— Ansar Eatvi

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Gulshan Shayari

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