जलती है रूह आज भी बाद-ए-बहार से
निकले नहीं अभी भी तेरे ही ख़ुमार से
क़श्ती न पाई हमने किए सैकड़ों जतन
तुमको पुकारते रहे दरिया के पार से
मारा हमें किसी की ज़ुबाँ और नज़र ने ही
हमको असर हुआ नहीं ख़ंजर के वार से
अब ख़ुद के दिल पे कोई भरोसा नहीं रहा
अपना तो ए'तिबार उठा ए'तिबार से
जो टूट जाये देख के बस चंद मुश्किलें
ख़ुद को बचाईयेगा सनम इस करार से
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