दिल-ए-नाशाद को ख़्वाहिश बहुत है
तसल्ली देने की वर्ज़िश बहुत है
मुहब्बत खींच लाती है वगरना
तुम्हारे शहर से रंजिश बहुत है
किसी का इश्क़ रक्खा है यहाँ पर
यहाँ सहरा की गुंजाइश बहुत है
किताबों पर ही गिर जाती है सिगरेट
तुम्हारी याद की लर्ज़िश बहुत है
मिलन की रात हम पर आख़िरी है
ख़ुदा है मेहरबाँ बारिश बहुत है
सुनो यारो सभी दीवार ढा दो
तुम्हारी दीद की जुंबिश बहुत है
तख़य्युल पर नई दस्तक हुई है
बहुत मंज़र हैं और काविश बहुत है
मिलेगा कैसे तुम को कोई 'सय्यद'
हमारे नाम पर बंदिश बहुत है
— Aves Sayyad















