ज़रा सी बात होने पर कभी सहरा नहीं जाते
रुको तुम बस यहीं पागल अजी सहरा नहीं जाते
उड़ाता धूल इक ख़त मेरे घर आया किसी का और
लिखा है मुझ को सहरा से कभी सहरा नहीं जाते
ख़ला, वीरानी, वहशत, रक़्स करते हैं वहाँ पर सब
सुनो मेरी पहाड़ों की परी सहरा नहीं जाते
हमें मिल जाता है कोई वसीला हिज्र में अब तो
मियाँ करते हैं बेशक आशिक़ी सहरा नहीं जाते
समंदर ही समझता है किसी के प्यास की शिद्दत
समंदर में उतारो तश्तरी सहरा नहीं जाते
तेरी बीवी है बच्चे भी हैं और माँ बाप भी बूढ़े
हो जाएगी यहाँ भी बंदगी सहरा नहीं जाते
कटा जाता था इनका पेट तेरा पानी पी पी कर
यहाँ के लोग वरना पूर्वी सहरा नहीं जाते
मुझी में ख़ौफ़ इन वीरानियों का इतना है अब तो
मेरी वहशत है अंदर चीख़ती सहरा नहीं जाते
ज़मीं सूखी पड़ी है आसमाँ है आग का पैकर
कहा बादल ने हम को साहिरी सहरा नहीं जाते
दिवानों के पसीने से बनाई जाती है मिट्टी
सुनो मोहतरमा हो के बावली सहरा नहीं जाते
ले जाते हैं ख़ला मिट्टी सभी भर भर के झोली में
मगर हम छोड़ कर ये मादरी सहरा, नहीं जाते
ग़ज़ल गूँजे हमारी दश्त के इन कारख़ानों में
अलग ये बात करने शायरी सहरा नहीं जाते
सुनो सय्यद मुहब्बत सारी मर जाती है दफ़्तर में
हमारे अहद के मजनूँ कभी सहरा नहीं जाते
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