junoon-e-had ki lakeer thaa | जुनून-ए-हद की लकीर था

  - Aves Sayyad

जुनून-ए-हद की लकीर था
में यहाँ पे मैं हूँ वहाँ पे वो है
कि ग़म सँभाले जहाँ में तेरे यहाँ पे मैं हूँ वहाँ पे वो है

है एक ख़ूबी ये दरमियानी जो कर रही है सभी को यकजा
सो दोनों तन्हा खड़े कमाने यहाँ पे मैं हूँ वहाँ पे वो है

तमाम दुनिया उसी के हिस्से मेरी विरासत है एक कमरा
चला रहे हैं निज़ाम अपने यहाँ पे मैं हूँ वहाँ पे वो है

यहाँ पे मैं हूँ हाँ सिर्फ मैं हूँ मेरे मुक़ाबिल नहीं है कोई
इसी गुमाँ में गुम इब्तिदास यहाँ पे मैं हूँ वहाँ पे वो है

अना के ख़ातिर ये हिज्र मौसम निभा रहे हैं सो इसलिए हम
अलग अलग हैं मगर अकेले यहाँ पे मैं हूँ वहाँ पे वो है

मैं अपने वादे मिटा चुका हूँ अब उसके वादे निभा रहा हूँ
कोई बताए मुझे ज़रा ये यहाँ पे मैं हूँ वहाँ पे वो है

जो आशनाई कभी थी हम में वो ख़ामुशी में बदल गई है
यूँँ बैठे अपने लबों को सीके यहाँ पे मैं हूँ वहाँ पे वो है

है दिल में वहशत ये दोनों जानिब बनाम दुनिया बनाम उलफ़त
मगर सजाए ख़ुशी लबों पे यहाँ पे मैं हूँ वहाँ पे वो है

उतर चुके हैं हम एक कश्ती किनारे ला कर मगर ये सय्यद
उसी जज़ीरे पे बस पुकारे यहाँ पे मैं हूँ वहाँ पे वो है

  - Aves Sayyad

Self respect Shayari

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