आशुफ़्ता वहशतों को मुकद्दर बना दिया
दुनिया की ठोकरों ने सुबुक-सर बना दिया
लायक तो खो गए हैं क़तारों की भीड़ में
मुझको सिफ़ारिशों ने सिकन्दर बना दिया
हम दोनों हिज्र काटने आए हैं एक साथ
दोनों को तेरे इश्क़ ने बे-घर बना दिया
चीख़ों से कोई काम जो लाया न जा सका
ख़ामोशियाँ समेट के लश्कर बना दिया
आलम भी दोस्त आग की गर्दिश में क़ैद है
सो दुश्मनों को राज़ का महवर बना दिया
पैकर में इक धड़कता हुआ दिल था पर मुझे
दफ़्तर की ख़्वाहिशात ने पत्थर बना दिया
'सय्यद' मेरे नसीब में कुछ भी नहीं रहा
इक जिस्म बख़्शा उसको भी बे-सर बना दिया
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