कोई तारा अब हमारा रहनुमा होता नहीं
ख़ाक-ए-जादा में तुम्हारा नक़्श-ए-पा होता नहीं
उस के दिल में मेरी ख़ातिर प्यार शायद घट गया
वो किसी मुद्दे पे अब मुझसे ख़फ़ा होता नहीं
रब्त धड़कन और साँसों का न हम पाते समझ
तुम से क़ायम गर हमारा राब्ता होता नहीं
आँख के ज़रिए पहुँच जाते हैं सब दिल में मगर
दिल से बाहर आने का कुछ रास्ता होता नहीं
जी में आता है करें इज़हार उन से इश्क़ का
हौसला करते हैं लेकिन हौसला होता नहीं
आज वो तन्हा है उस से जो भी कहना है कहो
बख़्त ‘जस्सर’ मेहरबाँ यूँ बारहा होता नहीं
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