हद से गुज़र गया ग़म-ए-दौराँ कभी कभी
दामन में अश्क हो गए ग़लताँ कभी कभी
जब ज़ो'म-ए-अक़्ल-ओ-होश से कुछ भी न बन सका
काम आ गई है जुरअत-ए-रिंदाँ कभी कभी
आते हैं इंक़लाब कभी बहर-ए-इंक़लाब
कश्ती को पार करते हैं तूफ़ाँ कभी कभी
सर दे दिया दिया न मगर ग़ैर-ए-हक़ का साथ
दुनिया में आए ऐसे भी इंसाँ कभी कभी
क्या कल्बा-ए-हज़ीं में नहीं रौनक़-ए-हयात
होता है दिल यहाँ भी ग़ज़ल-ख़्वाँ कभी कभी
घबरा के ज़िंदगी से तलाश-ए-क़रार में
छानी है ख़ाक-ए-दश्त-ओ-बयाबाँ कभी कभी
हर चंद है दकन से मुझे प्यार 'ताहिरा'
आती है याद महफ़िल-ए-तहराँ कभी कभी
— Bano Tahira Sayeed















