कहते बहुत थे दुख मेरी क़िस्मत नहीं
अब वक़्त जो बदला तो क्यूँ हिम्मत नहीं
अब रोज़ आते है उठा के अपना मुँह
इन आँसुओं की अब कोई क़ीमत नहीं
और हम ने दुख अपना सुनाया अपनों को
पर अपनों में अपनी कोई इज़्ज़त नहीं
— Brajnabh Pandey
अब वक़्त जो बदला तो क्यूँ हिम्मत नहीं
अब रोज़ आते है उठा के अपना मुँह
इन आँसुओं की अब कोई क़ीमत नहीं
और हम ने दुख अपना सुनाया अपनों को
पर अपनों में अपनी कोई इज़्ज़त नहीं
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