वो शांत बैठा है कब से मैं शोर क्यूँँ न करूँँ
बस एक बार वो कह दे कि चुप तो चूँ न करूँँ
ख़ताएँ इसलिए करता हूँ मैं कि जानता हूँ
सज़ा मुझे ही मिलेगी ख़ता करूँँ न करूँँ
दुखी हूँ मैं कि हमें एक दिन बिछड़ना है
बिछड़ना है तो रियाज़त अभी से क्यूँँ न करूँँ
जो 'इश्क़ करता है आख़िर में अहद करता है
कि अब मैं 'इश्क़ न औरों को करने दूँ न करूँँ
मेरे 'चराग़'-ए-अना को है अब लहू दरकार
तो क्या करूँँ मैं अगर ख़्वाहिशों का ख़ूँ न करूँँ
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