वो शांत बैठा है कब से मैं शोर क्यूँँ न करूँँ
बस एक बार वो कह दे कि चुप तो चूँ न करूँ
ख़ताएँ इस लिए करता हूँ मैं कि जानता हूँ
सज़ा मुझे ही मिलेगी ख़ता करूँ न करूँ
दुखी हूँ मैं कि हमें एक दिन बिछड़ना है
बिछड़ना है तो रियाज़त अभी से क्यूँ न करूँ
जो इश्क़ करता है आख़िर में अहद करता है
कि अब मैं इश्क़ न औरों को करने दूँ न करूँ
मेरे 'चराग़'-ए-अना को है अब लहू दरकार
तो क्या करूँ मैं अगर ख़्वाहिशों का ख़ूँ न करूँ
— Charagh Sharma















