बहुत बे-दर्द लम्हा था
हमारे दरमियाँ आ कर नहीं पल भर रुका जानाँ
न हम दोनों से कुछ पूछा
न उस ने कुछ भी बतलाया
फ़क़त छू कर हमें गुज़रा
लहू में सरसराहट सी
ज़बाँ में लड़खड़ाहट सी
अता कर के भुला बैठा
बहुत बे-दर्द लम्हा था
बहुत ही याद आता है
— Fakhira batool















