Fakhira batool

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Fakhira batool shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Fakhira batool's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

सामान तू ने रख लिया जाते हुए तमाम लेकिन तेरा ध्यान मेरे पास रह गया — Fakhira batool

Ghazal

इश्क़ पागल कर गया तो क्या करोगे सोच लो सानेहा ऐसा हुआ तो क्या करोगे सोच लो साथ उस के हर क़दम चलने की आदत किस लिए छोड़ कर वो चल दिया तो क्या करोगे सोच लो शोर बाहर है अभी इस वास्ते ख़ामोश हो शोर अंदर से उठा तो क्या करोगे सोच लो कर रहे हो घर नया ता'मीर उड़ती रेत पर ये अचानक गिर गया तो क्या करोगे सोच लो लौट कर जाना तो है आख़िर सभी को उस तरफ़ सौ बरस भी जी लिया तो क्या करोगे सोच लो धड़कनें मद्धम हुई जाती हैं ऐ चारागरो चाक दिल का सिल गया तो क्या करोगे सोच लो बंद पलकों में अधूरे ख़्वाब बनते हो मगर कोई इन में आ बसा तो क्या करोगे सोच लो दर दरीचे सब मुक़फ़्फ़ल कर के बैठे हो मगर वो अचानक आ गया तो क्या करोगे सोच लो डूबते सूरज का चेहरा और उस का नक़्श-ए-पा जब ये मंज़र गुम हुआ तो क्या करोगे सोच लो — Fakhira batool
उस को भूले बिना कोई चारा नहीं वो हमारा नहीं इश्क़ इक बार है ये दोबारा नहीं वो हमारा नहीं कोई फूलों से ख़ुश्बू को आ के चुने कोई गजरे बुने ये मोहब्बत है इस में ख़सारा नहीं वो हमारा नहीं नींद आँखों ही आँखों में कटती गई पौ भी फटती गई याद करते रहे पर पुकारा नहीं वो हमारा नहीं कोई शिकवा नहीं आशनाई नहीं जग-हँसाई नहीं बस हमें उस से मिलना गवारा नहीं वो हमारा नहीं हम तो कहते हैं वो भी जले आग में दर्द के राग में कोई तश्बीह न इस्तिआ'रा नहीं वो हमारा नहीं इश्क़ नाशाद है इश्क़ बर्बाद है इश्क़ फ़रियाद है इस समुंदर का कोई किनारा नहीं वो हमारा नहीं चाँद सूरज सितारे वही आसमाँ कुछ नहीं दरमियाँ कोई शिकवा शिकायत इशारा नहीं वो हमारा नहीं बीती यादों को दिल से भुलाना पड़ा लौट जाना पड़ा अपना इस शहर में अब गुज़ारा नहीं वो हमारा नहीं ये कहानी हमारी तुम्हारी भी है आह-ओ-ज़ारी भी है कोई जीता नहीं कोई हारा नहीं वो हमारा नहीं — Fakhira batool

Nazm

ज़माना चाहता है हर-घड़ी बस नित-नई बातें नए दिन और नई शा में नई सुब्हें नई रातें नई क़स्में नए वादे नए रिश्ते नए नाते पुराने जो भी क़िस्से थे वो अब उस को नहीं भाते मैं ख़ुद लफ़्ज़ों की मिसरों की बहम तकरार से जानाँ बहुत उक्ता गई थी अब तो मैं ने यूँँ किया लफ़्ज़ों को मिसरों को लपेटा सुर्ख़ काग़ज़ में फिर उन को मन में रक़्साँ आग दिखला दी हवा में राख के उड़ते हुए ज़र्रों ने जब पूछा करेगी क्या सुनेगी क्या कहेगी क्या तिरा दामन तो ख़ाली है कहा मैं ने मुझे अब कुछ नहीं करना मुझे अब कुछ नहीं सुनना मुझे अब कुछ नहीं कहना कहानी ओढ़ ली मैं ने — Fakhira batool