मत तहज़ीब तमद्दुन की तुम हम से बात करो

दिल का दर्द छलक जाएगा वर्ना आँखों से
ग़ैरत के उस नाम पे अब तक जितने ख़ून हुए
उन में कल इक चार साल की बच्ची भी देखी
जिस ने हाथ में कपड़े की इक गुड़िया थामी थी
मुट्ठी में इक टॉफ़ी थी जो उस ने खानी थी
उस की पलकों पर हैरत थी
हैरत में था ख़ौफ़
गर्दन पर ख़ंजर का घाव इतना गहरा था
जैसे उस को काटने वाला हाथ पराया हो
घर के ग़ैरत-मंद मर्दों से पूछ सकी न वो
बाबा भय्या बोलो ग़ैरत किस को कहते हैं
मत तहज़ीब तमद्दुन की तुम हम से बात करो

— Fakhira batool

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