सितम तो ज़िंदगी दोहरा रही है

ख़ताओ को सही ठहरा रही है

मैं रखना चाहता हूँ पाँव अंदर
मेरी चादर सिमटती जा रही है

वबास पेड़ पंछी सारे ख़ुश हैं
किसी को तो तबाही भा रही है

बताओ तो तुम्हें क्यूँ ना जगाएं
तुम्हारी नींद आँखें खा रही है

अजी तबीयत सुधर के ही रहेगी
दवा ले लो दवा समझा रही है

रिवीजन चल रहा है ज़िन्दगी का
पलट दो फैसले समझा रही है

ये रिश्तों में दरारें दिख रही हैं
दरारों में दिवारें आ रही हैं

वो कहती है उसे मैं भूल जाऊँ
जो मेरी ज़ीस्त का हिस्सा रही है

मिलाकर उन से फिर तरसा रही है
हमारी उम्र को बढ़वा रही है

— Gagan Bajad 'Aafat'

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