नज़्म- अजनबी महबूबा

हम तुझे जानते न थे पहले
तुझ को पहचानते न थे पहले

आज तुझ को जो जान पाए हैं
मेरे अश'आर जगमगाए हैं

तू कोई आन बान वाली है
तू हसीनों में शान वाली है

तू समुंदर सा गहरा पानी है
तेरे होने से सब कहानी है

तू मिला है मुझे मनाने से
आज मैं ख़ुश हूँ तेरे आने से

तुझ को मैं रास्ता अगर कह दूँ
तुझ को जीने का गर हुनर कह दूँ

तुझ को अपनी मता-ए-जाॅं कह दूँ
तुझ को अपना मैं हमनवा कह दूँ

मेरा तुझ से ही राब्ता है अब
सदियों सदियों का वास्ता है अब

दूर मैं तुझ से अब किधर जाऊॅं
तुझ को मैं देख कर सॅंवर जाऊॅं

मुझ को साया भी तेरा भाता है
रात दिन तू ही याद आता है

तेरे होने से मुयस्सर है सुकूॅं
बिन तेरे मैं तो कहीं भी न रहूॅं

हो के अनजान अब नहीं जीना
बिन तेरे जान अब नहीं जीना

तुम पे सब कुछ मैं आज हारा हूँ
तुम मेरे और मैं तुम्हारा हूँ

— Hameed Sarwar Bahraichi

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