भरा हुआ है शजर अब तो ज़र्द रंगों से
है इस पे आई ख़िज़ाँ आप अपनी जंगों से
हक़ीक़तें हैं अमाँ अब तो जुर्म की मानिंद
यहाँ पे कटते हैं सर भी यूँ ही पतंगों से
तिज़ारतें हैं बदन की यूँ ख़ून से रंगीं
कमा रहे हैं ये रोटी किसी के अंगों से
ग़रीब फँस ही गया फिर उन्हीं के झाँसे में
फँसा दिया है दलालों ने अपने ढंगों से
मैं सामने यूँ ही 'रेहान' कब तलक बैठूँ
कोई तो आए निकाले मुझे सुरंगों से
— REHAN KHAN















