ऐसा नहीं कि मुझ को मोहब्बत हुई नहीं
ये और बात जिस से हुई वो मिली नहीं
हर शख़्स छूना चाहता है सिर्फ़ जिस्म को
ला'नत है उस की रूह किसी ने छुई नहीं
वो शादी तो करेगी मगर एक शर्त पर
हम हिज्र में रहेंगे अगर नौकरी नहीं
वो साथ थी तो ज़िंदगी जन्नत सी थी मिरी
अब जी रहा हूँ मैं जिसे वो ज़िंदगी नहीं
अपने ग़मों को शा'इरी से हल्का करते हैं
हर कोई ख़ुद-कुशी करे ये लाज़िमी नहीं
कितना ज़ियादा दर्द है हम टूटे लोगों में
ग़ज़लें हमारी याँ पे किसी से छुपी नहीं
— Harsh saxena















