मैं तेरे पास क्यूँँ आया बेकार में?
दर्द मिलता रहा उम्र भर प्यार में
ढूँढ़ते ढूँढ़ते, मैं यहाँ थक गया
माँ, पिता-सा, नहीं कोई संसार में
अब तो उस के भी शादी के दिन आ गए
ज़िंदगी मेरी गुज़री है रफ़्तार में
वो मुसलसल उसे देखती रह गई
जब मेरी फोटो आई थी अख़बार में
मेरी इज़्ज़त से उस को बहुत प्यार था
फूल जड़ती थी वो मेरे दस्तार में
जब तुझे छू के मुझ तक हवा आती है
दर्द-ओ-ग़म आते हैं मेरे अश'आर में
जीत का जश्न मैं भी मनाता मगर
हार जाता है ‘वर्धन’ तेरी हार में
— Harshwardhan Aurangabadi















