जो मंज़िल बन गई हो तुम तो राही बन गया हूँ मैं
अगर काग़ज़ बनी हो तुम तो स्याही बन गया हूँ मैं
ज़माने की कचहरी में खड़े होना है अक्सर ही
बनी हो साक्षी तुम तो गवाही बन गया हूँ मैं
मोहब्बत दिल की ख़्वाहिश हो तो मेरी तुम ज़रा सुन लो
बनोगी साक्षी जो तुम तो माही बन गया हूँ मैं
— Shivam Mishra















