shehar-e-gul ke khas-o-khaashaak se khauf aata hai | शहर-ए-गुल के ख़स-ओ-ख़ाशाक से ख़ौफ़ आता है

  - Iftikhar Arif

शहर-ए-गुल के ख़स-ओ-ख़ाशाक से ख़ौफ़ आता है
जिस का वारिस हूँ उसी ख़ाक से ख़ौफ़ आता है

शक्ल बनने नहीं पाती कि बिगड़ जाती है
नई मिट्टी को नए चाक से ख़ौफ़ आता है

वक़्त ने ऐसे घुमाए उफ़ुक़ आफ़ाक़ कि बस
मेहवर-ए-गर्दिश-ए-सफ़्फ़ाक से ख़ौफ़ आता है

यही लहजा था कि मेयार-ए-सुख़न ठहरा था
अब इसी लहजा-ए-बे-बाक से ख़ौफ़ आता है

आग जब आग से मिलती है तो लौ देती है
ख़ाक को ख़ाक की पोशाक से ख़ौफ़ आता है

क़ामत-ए-जाँ को ख़ुश आया था कभी ख़िलअत-ए-इश्क़
अब इसी जामा-ए-सद-चाक से ख़ौफ़ आता है

कभी अफ़्लाक से नालों के जवाब आते थे
इन दिनों आलम-ए-अफ़्लाक से ख़ौफ़ आता है

रहमत-ए-सय्यद-ए-लौलाक पे कामिल ईमान
उम्मत-ए-सय्यद-ए-लौलाक से ख़ौफ़ आता है

  - Iftikhar Arif

Wahshat Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Iftikhar Arif

As you were reading Shayari by Iftikhar Arif

Similar Writers

our suggestion based on Iftikhar Arif

Similar Moods

As you were reading Wahshat Shayari Shayari