जिस्म के रास्तों से गुज़र कर मुतमइन नफ़्स की आरज़ू मेंजो भी निकला वो वापस न आयारूह की वहशतों में उलझ करमुतमइन नफ़्स की आरज़ू मेंजो भी निकला वो वापस न आयालोग फिर देखते क्यूँ नहीं हैंलोग फिर सोचते क्यूँ नहीं हैंलोग फिर बोलते क्यूँ नहीं हैं— Iftikhar Arif