ख़्वाब-ए-ख़स-ख़ाना-ओ-बरफ़ाब के पीछे पीछे

गर्मी-ए-शहर-ए-मुक़द्दर के सताए हुए लोग
कैसी यख़-बस्ता ज़मीनों की तरफ़ आ निकले

मौज-ए-ख़ूँ बर्फ़ हुई जाती है साँसें भी हैं बर्फ़
वहशतें जिन का मुक़द्दर थीं वो आँखें भी हैं बर्फ़
याद-ए-यारान-ए-दिल-आवेज़ का मंज़र भी है बर्फ़
एक इक नाम हर आवाज़ हर इक चेहरा बर्फ़
मुंजमिद ख़्वाब की टिकसाल का हर सिक्का बर्फ़
और अब सोचते हैं शाम-ओ-सहर सोचते हैं
ख़्वाब-ए-ख़स-ख़ाना-ओ-बरफ़ाब से वो आग भली
जिन के शोलों में भी क़िर्तासक़लम ज़िंदा हैं
जिस में हर अहद के हर नस्ल के ग़म ज़िंदा हैं
ख़ाक हो कर भी ये लगता था कि हम ज़िंदा हैं

— Iftikhar Arif

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