रू-ब-रू तेरे बहुत देर बिठाया गया मैं

वज्द में आया नहीं वज्द में लाया गया मैं

सिलसिला ख़त्म न होगा ये दिल-आज़ारी का
इस से पहले भी कई बार मनाया गया मैं

यूँ लगा सब ने गवाही दी कि तू मेरा है
जब तिरे नाम से बस्ती में सताया गया मैं

जब जब असरार मिरी ज़ात के खुलने से रहे
छेड़ कर ज़िक्र तिरा वज्द में लाया गया मैं

मुझ से रस्ते में ठहरने की अज़िय्यत पूछो
ठोकरें मार के रस्ते से हटाया गया मैं

— Ismail Raaz

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Raasta Shayari

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