लाख आवारा सही शहरों के फ़ुटपाथों पे हम

लाश ये किस की लिए फिरते हैं इन हाथों पे हम

अब उन्हीं बातों को सुनते हैं तो आती है हँसी
बे-तरह ईमान ले आए थे जिन बातों पे हम

कोई भी मौसम हो दिल की आग कम होती नहीं
मुफ़्त का इल्ज़ाम रख देते बरसातों पे हम

ज़ुल्फ़ से छनती हुई उस के बदन की ताबिशें
हँस दिया करते थे अक्सर चाँदनी रातों पे हम

अब उन्हें पहचानते भी शर्म आती है हमें
फ़ख़्र करते थे कभी जिन की मुलाक़ातों पे हम

— Jaan Nisar Akhtar

More by Jaan Nisar Akhtar

Other ghazal from the same pen

See all from Jaan Nisar Akhtar →

Aanch Shayari

Shers of aanch.

All Aanch Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling