क्या क्या दिलों का ख़ौफ़ छुपाना पड़ा हमें
ख़ुद डर गए तो सब को डराना पड़ा हमें
इक दूसरे से बच के निकलना मुहाल था
इक दूसरे को रौंद के जाना पड़ा हमें
अपने दिए को चाँद बताने के वास्ते
बस्ती का हर चराग़ बुझाना पड़ा हमें
वहशी हवा ने ऐसे बरहना किए बदन
अपना लहू लिबास बनाना पड़ा हमें
ज़ेली हिकायतों में सभी लोग खो गए
क़िस्सा तमाम फिर से सुनाना पड़ा हमें
'आली' अना पे सानेहे क्या क्या गुज़र गए
किस किस की सम्त हाथ बढ़ाना पड़ा हमें
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Jaleel 'Aali'
our suggestion based on Jaleel 'Aali'
As you were reading Anjam Shayari Shayari