ये ग़म क्या दिल की आदत है? नहीं तो - Jaun Elia

ये ग़म क्या दिल की आदत है? नहीं तो
किसी से कुछ शिकायत है? नहीं तो

है वो इक ख़्वाब-ए-बे ताबीर इसको
भुला देने की नीयत है? नहीं तो

किसी के बिन, किसी की याद के बिन
जिये जाने की हिम्मत है? नहीं तो

किसी सूरत भी दिल लगता नहीं? हां
तो कुछ दिन से ये हालात है? नहीं तो

तुझे जिसने कही का भी नहीं रखा
वो एक जाति सी वहशत है? नहीं तो

तेरे इस हाल पर है सब को हैरत
तुझे भी इस पे हैरत है? नहीं तो

हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी
तुझे इस पर नदामत है? नहीं तो

वो दरवेशी जो तज कर आ गया.....तू
यह दौलत उस की क़ीमत है? नहीं तो

हुआ जो कुछ यही मक़सूम था क्या?
यही सारी हिकायत है? नहीं तो

अज़ीयत-नाक उम्मीदों से तुझको
अमन पाने की हसरत है? नहीं तो

तू रहता है ख्याल-ओ-ख्वाब में गम
तो इस वजह से फुरसत है? नहीं तो

वहां वालों से है इतनी मोहब्बत
यहां वालों से नफरत है? नहीं तो

सबब जो इस जुदाई का बना है
वो मुझसे खुबसूरत है? नहीं तो

Jaun Elia
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