suraj dhalt hai | सूरज ढलता है

  - Jawayd Anwar

सूरज ढलता है
और बम गिरता है

और बम गिरते हैं
सूरज ढलने से
सूरज चढ़ने तक

चढ़े हुए दिन में भी इधर उधर
बम गिरते रहते हैं
लेकिन कोई चीख़ सुनाई नहीं देती
पहले देती थी
अब कोई नहीं रोता

गहरे गहरे गढ़े हैं और गढ़ों
में
गलता हुआ इंसानी मास है बचा-खुचा
और चारों जानिब
ईंटें पत्थर सरिया टूटे हुए
दरवाज़े खिड़कियाँ कुत्ता बिल्ली चील
और डरे डरे कुछ लोग
उधर उधर से झाँकते हैं
उधर उधर छुप जाते हैं
बम गिरता है

लेकिन एक खंडर में सिगरेट जलता है
बुझता है
जलता है
डर ग़ुस्से में ढलता है
रॉकेट चलता है

रॉकेट चलता है
दुनिया चीख़ती है
और बम गिरता है
तो
किसी को सुनाई नहीं देता
किसी को दिखाई नहीं देता

  - Jawayd Anwar

Duniya Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Jawayd Anwar

As you were reading Shayari by Jawayd Anwar

Similar Writers

our suggestion based on Jawayd Anwar

Similar Moods

As you were reading Duniya Shayari Shayari