"बहुत याद आते हो तुम"
गर तन्हा सफ़र हो
और लंबी डगर हो
हो राहें भी मुश्क़िल
बेगाना शहर हो
जिधर भी मैं देखूँ
नज़र में हो तुम्हीं
गुलाबों के पाक़ी
शजर में हो तुम्हीं
है आँखों में मेरी
अब आँसू की धारा
मैं ख़ुद से हूँ जीता
और अपनों से हारा
अँधेरों से अब भी
मैं डरता हूँ पापा
मैं तुम को बहुत
याद करता हूँ पापा
दीवारों में अक्सर
क्यूँ आते हो तुम
क्यूँ ख़ल्वत में मुझ को
रुलाते हो तुम
बहुत याद आते हो तुम
बहुत याद आते हो तुम
— "Nadeem khan' Kaavish"















