"ज़िन्दगी की हक़ीक़त"

तमाम उम्र चलता रहा,
ये सिलसिला जीने के लिए।
मौत की दहलीज़ पर आ कर जाना,
ज़िन्दगी को कैसे जिए
आए मौत की कगार पर,
तो दुआएँ तमाम रात की।
ज़िन्दगी जीने के सिलसिले में,
मौत से मुलाक़ात की

बचपन से रुख़सत होते ही,
ज़िम्मेदारियों से घिर गए हम
चाँद पाने की ख़्वाहिश में,
अपने ही क़दमों में गिर गए हम
ख़ुद की महफ़िल सूना छोड़कर,
सब महफ़िलें आबाद की।
ज़िन्दगी जीने के सिलसिले में,
मौत से मुलाक़ात की

तुम को क्या लगता हैं,
ये ज़िन्दगी बहुत आसान हैं?
अगर तुम बे-ईमान हो,
तो फिर ये भी बहुत बे-ईमान हैं
इक तेरे ही सिलसिले में तो,
मैं ने तुझ से बात की।
ज़िन्दगी जीने के सिलसिले में,
मौत से मुलाक़ात की

यहाँ चाँद की नींद अधूरी है,
सूरज को पसीना भरपूर है।
जो किसी काम के नहीं हैं,
ऐसे सितारों को भी ग़ुरूर हैं
इक आसमाँ छूने की ख़ातिर,
सब ख़्वाहिशें बर्बाद की
ज़िन्दगी जीने के सिलसिले में,
मौत से मुलाक़ात की

— "Nadeem khan' Kaavish"

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Falak Shayari

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