वो शब के साथ रहे या सहर का हो जाए

उसे ये हक़ है कि चाहे जिधर का हो जाए

नज़र उठाए तो कर दे वो आफ़ताब को राख
किसी के बस में नहीं उस नज़र का हो जाए

छुपे ही रहने दे ज़ख़्मों को,खींच मत चादर
बुरा न हाल कहीं चारा-गर का हो जाए

जो बेहुनर थे तिरे शहर में, हुए वो शाह
मैं सोचता था यहाँ कुछ हुनर का हो जाए

बिछड़ने वाले बिछड जा मगर यही डर है
बिछड के मुझ से न तू दर ब दर का हो जाए

उठा के लाश मेरी क़ब्र में लिटा दे दोस्त
थका हुआ ये मुसाफ़िर भी घर का हो जाए

ख़ुदा करे कि ज़माना बिठाये पलकों पर
मैं चाहता हूँ वो हर इक नज़र का हो जाए

— Daagh Aligarhi

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