अजनबी मरहले मेरे बस में नहीं
मंज़िलें कौन सी दस्तरस में नहीं
बात कुछ भी न है क्यूँँ पता है नहीं
राज़ कोई कभी हम-नफ़स में नहीं
आज भी याद है गुनगुनाना तेरा
और वो अब किसी भी जरस में नहीं
फिर मुसलसल तिरी याद आती रही
आज वो बात तार-ए-नफ़स में नहीं
खेत कोई हरे, क्यूँ न दिखते वहाँ
जंग की वज्ह अब के बरस में नहीं
कब तलक भागता, मैं 'मनोहर' यहाँ
सिर्फ़ हूँ दस्तरस में हवस में नहीं
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