mahz jidd-o-jahd bhi ik kaam hi hai | महज़ जिद्द-ओ-जहद भी इक काम ही है

  - Manohar Shimpi

महज़ जिद्द-ओ-जहद भी इक काम ही है
कश्मकश से फिर मिले अंजाम ही है

मयकदे में क्या सभी का काम ही है
कोई उन
में से कहाँ बदनाम ही है

कोई जब भी हो बुलंदी पर तभी फिर
जो बढ़े है वो उसी का नाम ही है

डर किसी को जब सताता 'इश्क़ में ही
'इश्क़ के वो नाम से गुमनाम ही है

एक जैसे सब लगे पीते हुए ही
कोई प्याले से न छलका जाम ही है

ज़िंदगी में धूप भी है छाँव भी है
जब कभी सूरज ढले तो शाम ही है

  - Manohar Shimpi

Shaam Shayari

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