एहसास जहन्नुम सा कराती है ये दुनिया
जन्नत का मगर ख़्वाब दिखाती है ये दुनिया
इंसान की तक़लीफ़ से क्या इस को ग़रज़ है
मुश्किल में नज़र अपनी चुराती है ये दुनिया
दुनिया नहीं आफ़त ये ग़रीबों के लिए है
कमज़ोर को दिन-रात सताती है ये दुनिया
दामन में समेटे है ग़िज़ाओं के ज़ख़ीरे
फिर क्यूँ कभी भूखा भी सुलाती है ये दुनिया
ख़ुशियों के भी मेले हैं तो मातम भी कहीं पे
क्या क्या न हमें रंग दिखाती है ये दुनिया
इंसान हो या कोई भी मख़लूक़ सभी को
मिट्टी में हर इक शय को मिलाती है ये दुनिया
अंदाज़ निराले हैं तो दस्तूर अजब है
पत्थर को भी भगवान बनाती है ये दुनिया
कुदरत की ये तख़्लीक़ समझ से ही परे है
सर फिर भी समझने में खपाती है ये दुनिया
तक़दीर पे करना न 'उमर' कोई तकब्बुर
साहिल पे भी कश्ती को डुबाती है ये दुनिया














