पूछा था आजिज़ी से तबीअत जनाब की
फिर ताब ही न ला सके उन के इताब की
कहता था कोई चाँद कोई फूल कोई हूर
कोई मिसाल ही न थी उस के शबाब की
माहिर थी जाँ-कनी में तो चारा-गरी में भी
क्या-क्या सिफ़त बयान करूँ अब सिहाब की
कुछ इज़्तिराब-ए-दिल से मेरी भी निजात हो
दो घूँट ही पिला दो मुझे भी शराब की
खो जाएँगे सब एक दिन इस काइनात में
क्या हैसियत है बहर के आगे हबाब की
था नाम मेरे इश्क़ का सब की ज़बान पर
देते थे दाद लोग मेरे इंतिख़ाब की
अफ़सोस उम्र भर रहा इस बात का 'उमर'
क्यूँ इश्क़ में ये ज़िंदगी अपनी ख़राब की
— Mohiuddin Qamaruddin Ansari














