साथ मेरे कभी चला होता

तो तुझे दर्द का पता होता

ख़्वाब टूटे हुए मिले मुझ को
काश पहले कभी जगा होता

मैं न होता दुखी बिछड़ने पर
यार दिल से गले लगा होता

देख तेरे क़दम नहीं बढ़ते
छोड़ जाना अगर सज़ा होता

एक ठोकर लगी मुझे फिर से
काश पहला निशाँ मिटा होता

फिर कहीं एक रोज़ जीता मैं
यार थोड़ा अगर बचा होता

मौत का है 'मनीष' दुख किस को
लाश का तो अता-पता होता

— Manish watan

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