बग़ैर दिल कि ये क़ीमत है सारे आलम की

कसो से काम नहीं रखती जिंस आदम की

कोई हो महरम शोख़ी तिरा तो में पूछूँ
कि बज़्म-ए-ऐश जहाँ क्या समझ के बरहम की

हमें तो बाग़ की तकलीफ़ से मुआ'फ़ रखो
कि सैर-ओ-गशत नहीं रस्म अहल-ए-मातम की

तनिक तो लुत्फ़ से कुछ कह कि जाँ-ब-लब हूँ मैं
रही है बात मिरी जान अब कोई दम की

गुज़रने को तो कज-ओ-वाकज अपनी गुज़रे है
जफ़ा जो उन ने बहुत की तो कुछ वफ़ा कम की

घिरे हैं दर्द-ओ-अलम में फ़िराक़ के ऐसे
कि सुब्ह-ए-ईद भी याँ शाम है महरम की

क़फ़स में 'मीर' नहीं जोश दाग़ सीने पर
हवस निकाली है हम ने भी गुल के मौसम की

— Meer Taqi Meer

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Hausla Shayari

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